मिल्खी - भाग 2
अंतिम संस्कार हुआ, गांव इकट्ठा हुआ और धीरे धीरे मिल्खी की पत्नी की यादें सिमित रह गयीं केवल उस के परिवार तक। मिल्खी खेत जाता, बच्चों का ख्याल रखता, और अपनी स्वर्गीय पत्नी को याद करता।
दादा जी बताते थे की एक दिन जब वो खेत से घर पहुंचा तो उसने देखा की तवा गरम था। उसने दूसरी और नज़र की तो उसे खाना पका हुआ रखा था लेकिन चूल्हे में न लकड़ी थी और न ही राख। ये देख के उसे अचम्भा हुआ की खाना आखिर कैसे तैयार हुआ। पहले उसे लगा की शायद आस पास के किसी परिवार ने उनके लिया खाना छोड़ा हो, क्योंकि उसके बच्चे अभी न ही इतने बड़े थे कि खाना बना सकें न ही उन्होंने पहले कभी बनाया था। उसने आभार प्रकट करना उचित समझा जिसने भी खाना बना के रखा था उनके प्रति। लेकिन उसे ज्ञात ना था कि वो आखिर धन्यवाद करे भी तो किस को। उसने अपने चचेरे भाईओं, भाभिओं आस पास के लोगों से पूछना शुरू किया किन्तु सबने ये मानने से मना कर दिया की उन्होंने भोजन बनाया है। आस पास भटकने के बाद जब वो घर आ कर अपने कमरे में घुसा तो अपनी पत्नी को चारपाई पर देख वो दर गया और उसकी चीख निकल गई। वो इतनी ज़ोर से चिल्लाया था की बाहर खेल रहे उसके बच्चे अंदर आ गए। उस ने मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। बच्चों ने सहम कर पूछा की ऐसा क्या हुआ कि वो इतनी ज़ोर से चिल्लाया , किन्तु वो उनसे क्या कहता ?
उसके माथे से पसीने की एक बूँद धीरे धीरे उसकी आंख तक आ चुकी थी, बच्चे ये देख कर और घबरा गए और फिर से पूछने लगे लेकिन मिल्खी के पास उनके प्रश्नों का कोई ठोस जवाब नहीं था। उसने बात को टालते हुए कहा की उसे एक सांप दिख गया था और उनको बहार जाने को कहा ताकि सांप उन्हें काट न ले। बच्चों के बाहर निकलते ही उसने किवाड़ बंद किया और उस के साथ सट्ट कर बैठ गया। उसने अपनी हथेली से अपना पसीना पोंछा और वहीँ बैठे बैठे सोचने लगा की ये महज एक छलावा था। कुछ क्षण बाद वो बहार निकला और अपने बच्चों के साथ खाना खाने बैठ गया। वो उनको खाते हुए देख रहा था और जैसे ही उस ने पहला निवाला हाथ में लिया उस के होश उड़ गए, बहुत दिनों से उसने ऐसा खाना नहीं खाया था, पहले निवाले में ही उसे अपनी स्वर्गीय पत्नी के हाथ के स्वाद की अनुभूति हो चुकी थी, उसके हाथों में अब दूसरा निवाला उठाने का साहस नहीं बचा था। वो और अधिक डर गया और अपने कमरे में जाने का साहस नहीं जुटा पाया। उसने बहार ही एक चटाई बिछाई और उस पर लेट गया। उसे इतना तो समझ में आ रहा था की खाना उसकी पत्नी ने ही बनाया था किन्तु अस्पष्ट था कि आखिर ऐसा कैसे मुमकिन है।
उस रात उसे नींद नहीं आई और वो केवल अपनी पत्नी को ढूंढते रहा आसमान के अगिनत तारों में। उसे बहुत वर्षों बाद उसमें अपनी माँ और पिता भी मिले। वो यही सोचता रहा की जो हुआ क्या वो उसके अंत का संकेत है या केवल एक बुरा सपना और यदि वो कल सुबह न उठे तो उस के बच्चों का ख्याल कौन रखेगा। इसी सोच में कब सूरज उगा, उसे ज्ञात न था। वो रोज़ की तरह फिर से उठा और रसोई में खाना बनाने के लिए गया। अंदर जाते ही उसे फिर से अंतिम संध्या वाला दृश्य मिला। वही पका हुआ खाना, चूल्हे में किसी प्रकार की आग या राख का कोई चिन्ह नहीं , वो भयभीत हुआ और उस ने सारा खाना उठा कर बहार फेंक दिया। उस ने आग जलायी और खाना बनाने बैठ गया। खाना तैयार कर वो खेत चला गया और शाम को जब वो वापिस आया तो फिर वही दृश्य , पका खाना, न आग, न राख। वो रसोई से निकला और जैसे ही अपने कमरे में घुसा, उसे फिर से पिछले कल का दृश्य देखने को मिला। उसकी पत्नी चारपाई पर बैठी थी। उसने चेहरे पर घूँघट ले रखा था लेकिन मिल्खी उसे पहचान चूका था। इस बार वो भयभीत नहीं हुआ। कुछ क्षण वो वहीँ किवाड़ के पास खड़ा रहा, बिना कुछ कहे बस खड़ा रहा। कुछ पल पश्चात् उसकी पत्नी ने अपना सिर थोड़ा ऊपर उठाया और धीमी आवाज़ में कहा -- मैंने वो भोजन बहुत प्रेम से बनाया था, आपको पसंद नहीं आया ? मिल्खी शांत रहा, वो बहार गया और फिर वापिस आया ये सोच कर कि शायद वो दोबारा अंदर जाये तो शायद उसे कमरा खली मिले। लेकिन वो वहीँ थी, स्थिर। अब मिल्खी थोड़ा डर चूका था किन्तु समझ चूका था की ये महज एक सपना नहीं है। उसने कांपते स्वर में कहा
-- क्या तुम सत्य हो?
-- हाँ।
-- मुझे भय है की मैं अपना संतुलन खो रहा हूँ।
-- (कांपते हुए) भय न कीजिए , मेरा ये लक्ष्य नहीं था। आप चाहें तो मैं जा सकती हूँ।
-- किन्तु कहाँ? तुम थी कहाँ पर ? मुझे अभी भी यह कुछ समझ नहीं आ रहा, ये सब हो क्या रहा है?
-- भयभीत न हों, मैं हमेशा से यहीं थी। प्रतिदिन आपको देखती थी, और कोसती थी खुद को की मैं कुछ कर नहीं सकती। मुझे बच्चों की बहुत याद आती है, उनको रोज़ देखती हूँ परन्तु उन्हें छू नहीं सकती, आपको छू नहीं सकती, अपने दुःख किस को बताती मैं?
-- लेकिन मृत्यु के पश्चात मुझे तुम्हारा दिखाई देना कैसे मुमकिन है? मृत्यु तो सत्य है ना?
-- क्या प्रेम से अधिक बड़ा सत्य है मृत्यु?
-- किन्तु संसार के बाकि मनुष्यों का क्या ? वो भी तो प्रेम करते हैं, उनके साथ तो ऐसा होता कभी ना देखा ना मैंने सुना।
-- क्या आपको दुःख है ? मेरे वापिस आने का ?
-- ऐसा नहीं है किन्तु ये सब मेरी समझ से बहुत परे है।
-- आप आइए , बैठ के आराम कीजिये, दिन भर खेत में काम कर थक गए होंगे।
ऐसा कह कर वो चारपाई से उठ गयी। मिल्खी डरा किन्तु आगे नहीं बढ़ा।
-- नहीं नहीं, मैं ठीक हूँ (डरते हुए)
-- आप अभी भी भयभीत हैं, मैं समझ सकती हूँ, ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता।
-- तुम आयी क्यों हो?
-- मुझ से आपका दुःख देखा नहीं जाता, मैंने विवाह के समय वचन दिया था की आपको कभी अकेला नहीं छोडूंगी और मैं अपने वचन पर खरी नहीं उतर सकी। मुझे क्षमा कीजियेगा किन्तु मैं केवल वही वचन पूरा करने आयी हूँ।
-- लेकिन कैसे ?
-- आप बच्चों के लिए खाना बनाते हो, खेत जाते हो , पशुओं की देखभाल करते हो, सब कुछ अकेले। आपके चेहरे पर मायूसी के आलावा कुछ नहीं दीखता। मैं कुछ नहीं कर सकती किन्तु मैंने सोचा की आपको भोजन तो बना सकती हूँ।
-- किन्तु भोजन बनाया कैसे? न चूल्हे में आग थी ना ही धुएं के निशान दिवार पर थे।
-- मुझसे आप वो प्रश्न नहीं कर सकते। मैं आपको इसका उत्तर नहीं दे पाऊँगी। मुझे वचन दीजिये की आप मुझ से प्रश्न नहीं करेंगे।
-- किन्तु....
-- वचन दीजिये
-- मैं वचन देता हूँ।
मिल्खी की पत्नी के चेहरे पर मुस्कान थी , मिल्खी को उसके अधर स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे
-- मैं ज्यादा तो नहीं कर सकती किन्तु अपने बच्चों को और आपको भोजन तो बना सकती हूँ
-- लेकिन उसकी कोई आवश्यकता है नहीं, मैं खुद भोजन बना रहा था और आगे भी बना लूंगा।
-- क्या आप मुझ से प्रेम नहीं करते ? क्या आपको मेरे हाथों के खाने का स्वाद ठीक नहीं लगता
-- ऐसा कुछ नहीं है, तुम समझने की कोशिश ....
-- कोशिश नहीं कर सकती, मैं अब जीवित नहीं हूँ , क्या आप मेरी एक बात नहीं मान सकते?
-- ठीक है...बना लेना खाना, लेकिन ध्यान रहे की बच्चे तुम्हें ना देखें , वो डर जायेंगे।
-- जी। आप भी मुझे आज के पश्चात् नहीं देख पाएंगे, मैं केवल यही बताने के लिए आयी थी की खाना मैं बना रही थी और आगे भी मैं ही बनाउंगी और उस दौरान आप रसोई में कभी नहीं आएंगे।
-- किन्तु ऐसा क्यों ?
-- वो मैं आपको नहीं बता सकती किन्तु वाचा दीजिये की जब मैं खाना बनाउंगी तो आप नहीं आएंगे और आप किसे से इस बात का ज़िक्र भी नहीं करेंगे की आपने मुझे देखा था।
-- किन्तु मुझे कैसा पता चलेगा की तुम रसोई में हो? न धुआं दिखाई पड़ता है न कोई और निशान।
-- यदि रसोई की ऊपर की खिड़की खुली हो तो समझ जाईयेगा कि मैं खाना बना रही हूँ और आप अंदर नहीं आओगे , यदि बंद हो तो मैं वहां नहीं मिलूंगी।
-- और यदि मैंने तुम्हे भोजन बनाते हुए देख लिया फिर क्या होगा ?
-- फिर मैं आपके लिए कभी भोजन नहीं बना पाऊँगी, ना ही कभी वापिस आउंगी।
-- किन्तु ऐसा क्यों है ? और मैं तुम्हे प्रतिदिन क्यों नहीं देख सकता?
-- जितना प्रेम सत्य है, मृत्यु भी उतनी ही सत्य है , मैं भगवन से ऊपर तो नहीं , उसके बनाये हर नियम का उल्लंघन नहीं कर सकती
इतने में मिल्खी के बेटे ने दरवाजा खटखटाया और जैसे ही मिल्खी घुमा और वापिस देखा तो उसकी पत्नी गायब थी।
उसने दरवाजा खोला और खाना खाने के लिए रसोई में चला गया अपने बच्चों को लेकर।
उस रत उसे फिर नींद नहीं आयी किन्त्य उसके हृदय में अब काम प्रश्न थे। एक यही प्रश्न था की भोजन बनाते हुए वो उसे क्यों नहीं देख सकता। सुबह हुई तो भोजन तैयार था। ऐसे ही उसकी दिनचर्या में एक बदलाव आ गया था जो अब रोज़ की बात थी - पका हुआ भोजन मिलना। किन्तु उसके मन में वही प्रश्न था की आखिर खाना बिना लकड़ी के बन कैसा रहा है। ऐसे ही दिन निकलते गए और मिल्खी ने अपनी पत्नी को फिर नहीं देखा। लेकिन एक दिन उसके मन में ये जानने की लालसा उठी की मैं देखूं तो सही की आखिर रसोई में आखिर हो क्या रहा। किन्तु उसे अपना वचन याद था... उसने जानना उचित ना समझा। लेकिन मनुष्य आखिर कब तक उत्तरहीन रह सकता है ?
एक दिन जब वो खेत से वापिस आया तो उसने देखा की खिड़की खुली हुई थी, वो आगे बढ़ा देखने के लिए किन्तु फिर से कुछ कदम ले कर वापिस मुड़ आया। वो कुछ दुरी पर खड़ा हो कर इंतज़ार करता रहा की खिड़की जल्दी बंद हो क्योंकि उसके सब्र का बाँध अब टूट रहा था। मिल्खी हार चूका था , उसके मस्तिष्क ने उस पर हावी होना शुरू कर दिया था। अब एक तरफ जिज्ञासा थी और एक तरफ वचन। जिज्ञासा ने हमेशा की तरह वचन को कमज़ोर साबित कर दिया। वो खिड़की की तरफ भागा और जैसे ही उसने अंदर देखा वो ज़ोर से चिल्लाया। उसकी पत्नी ने मुड़ कर उसकी तरफ देखा, थोड़ा मुस्कुराई लेकिन उसकी आँखों से आंसू स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे उसके गालों पर बहते हुए।
उसने कंपते हुए स्वर में, हलकी मुस्कान के साथ कहा
-- आप अपना वचन नहीं रख पाए , मुझे क्षमा कीजियेगा अपना और हमारे बच्चों का ध्यान रखियेगा।
बस इतना कह कर वो ओझल हो गयी। न कोई अलविदा न कोई प्रश्न। उसकी चीख सुन कर आस पास के लोग इकट्ठा हो गए और पूछने लगे की क्या हुआ। इस बार वो हार चूका था, उसने सारी कहानी गांव वालों को सुनाई। किसी को उसकी बात पर भरोसा नहीं हुआ किन्तु उस ने बाहर खड़े खड़े चूल्हे की तरफ इशारा किया, कोई शब्द नहीं , उसमें हिम्मत नहीं थी कि वो समझा पाए किसी को की आखिर हुआ क्या था। उसने पहले शुरू से पूरी बात बताई और फिर उनको बताया की जब उसने खिड़की में से देखा तो उसकी पत्नी ने अपनी टांग चूल्हे में डाली थी और उसमें आग धधक रही थी और यही कारण था की उसकी इतनी ज़ोर से चीख निकली थी। लोगों में ये बात काफी तेज़ी से फ़ैल गयी की ऐसी कोई घटना हुई है।
मिल्खी उस रात फिर बाहर सोया। उसे आसमान में वो तारा नहीं मिला जिसे वो अपनी पत्नी मानता था, फिर वो पूरी रात जाग कर उस खिड़की की और देखता रहा इसी आस में की वो खुल जाए। लेकिन मिल्खी की पत्नी अपने वचन की सच्ची थी...मिल्खी सुबह तक एकटक खिड़की को देखता रहा और खिड़की, बंद रही।
वो रसोई में गया तो उसने देखा की सब कुछ वैसा ही था जैसा वो कल छोड़ कर गयी थी...मिल्खी को आभास हो गया था की उसने कितनी बड़ी गलती की है लेकिन अब उसको सुधारने का कोई रास्ता नहीं था। उस दिन वो खेत नहीं गया। वो जो सामान ले जा सकता था उसने इकट्ठा किया और गांव वालों को बिना बताये , अपने दो छोटे बच्चों के साथ कहीं चला गया। कहाँ? किसी को नहीं पता। समय के साथ साथ ये खबर आस पास के गांवों में भी फ़ैल गयी और उस गांव को धीरे धीरे लोग "चुड़ैलु" के नाम से बुलाने लगे। मिल्खी का घर जहाँ था, वहां केवल अब मिटटी है, कोई वहां नहीं रहना चाहता।
मिल्खी की पत्नी नहीं रही, ना मिल्खी रहा और ना ही अब शायद उसके बच्चे ही जीवित होंगे,... जीवित है तो केवल नाम "चुड़ैलु".
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