मिल्खी - भाग १
मैं महज छह साल का था जब मैंने पहली बार ये कहानी सुनी थी और हमेशा से लगता था की ऐसा होना असंभव है। एक गांव जिसका नाम 'चुडैलु' हो...सुनने में काफी अजीब लगता है, नाम से अधिक अजीब है इस नाम के पीछे की कहानी। मेरे दादा ने मुझे ये कहानी जब सुनाई थी तब मैं एक बच्चा था और अब जब मैं ये सोचता हूँ तो समझ आता है की मेरे दादा को अंदाज़ा नहीं रहा होगा की इस तरह की कहानी बच्चे को सुनना उचित है भी या नहीं।
खैर, बात है कोई डेढ़ सौ साल पहले की, एक गांव था हमारे गांव से कौसों दूर, उस ज़माने में उसका क्या नाम था मुझे मालूम नहीं, ना मैंने कभी पूछना उचित समझा क्योंकि मेरे लिए ये केवल एक कहानी ही रही, काफी समय तक, तब तक जब तक मैं खुद उस गांव के करीब नहीं पहुँचा था।
दादा बताते हैं की 'मिल्खी' नाम का एक किसान था, कद में छोटा, दुबला लेकिन उसका शरीर देख कर कोई उसके काम करने की काबिलियत का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। बचपन में ही, जब वो मात्र चार साल का था, उसके पिता की मृत्यु गांव में अकाल पड़ने से हो गयी थी, उस समय गांव की जनसँख्या इस अकाल के कारण काफी कम हो गयी थी। कम जनसँख्या के चलते शादियों के लिए वर-वधु दूसरे गांव से चुने जाते थे। मिल्खी की माता बहुत सादी सी कामकाजी महिला थी, अपने दौर की बाकि महिलाओं की तरह, उन्होंने महाजनों के घर जैसे तैसे काम कर मिल्खी को बड़ा किया, लेकिन अनजान कारणों से, उसकी माँ का भी एक दिन निधन हो गया, मिल्खी उस समय कोई १० वर्ष का रहा होगा। सौभाग्य से मिल्खी अपने माता की इकलौती संतान था। मिल्खी जब बारह वर्ष का हुआ तो उसके चाचा ने पास के गांव के एक किसान की बेटी से मिल्खी का विवाह करवा दिया।
दादा कहते हैं "मैंने कभी उसकी पत्नी का चेहरा तो नहीं देखा लेकिन जैसा की लोग बताया करते थे, ये जान पड़ता था की वो बहुत ही खूबसूरत रही होगी। वो एक महीन कपडे का घूँघट अपने सिर पर हर समय लेकर रखती थी लेकिन वो घूँघट उसकी खूबसूरती को छुपाने में अक्सर नाकाम रहता था। उसकी भूरी आंखें घूँघट के पर साफ दिखाई देतीं थीं , रंग सांवला लेकिन चेहरे की बनावट ऐसी की तुम अगर नास्तिक हो तो उसकी एक झलक पाने के बाद तुम भगवान को मानना शुरू कर दो।" कभी कभी मैं सोचता हूँ की काश मैंने उसे देखा होता। मेरे दादा को उसके चेहरे का सम्पूर्ण विवरण मालूम है किन्तु उसका नाम वो नहीं जानते, न ही उन्होंने मुझे कभी कोई झूठा नाम उसका बताया।
दहेज में मिल्खी को एक भैंस, चारपाई और कुछ बर्तन मिले। जो भी इस दम्पति को पहली बार देखता अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पता था, मिल्खी कद में अपनी पत्नी से छोटा था और अक्सर हंसी का पात्र बनता था किन्तु वो हंसी में ही उन सब कटाक्षों को भूल जाता था। साल बीते मिल्खी के घर एक बेटी ने जनम लिया, मिल्खी उस से जितना प्रेम था वो एक तरफ लेकिन गांव वालों और अपना वंश आगे बढ़ने वाली रूढ़िवादी सोच के चलते वो उतना खुश नहीं था, अगले ही वर्ष उस के घर एक पुत्र ने जनम लिया और अब ऐसा लगने लगा था की और किसी चीज़ की कमी रही नहीं थी. लेकिन खुश चेहरे देख कर अक्सर लोगों के चेहरे मुरझा जाते हैं, इसे बुरी नज़र कहो या महज इत्तेफ़ाक़, मिल्खी की पत्नी शादी के चार साल बाद, एक रात बहुत बीमार पड़ी। बीमारी का कारण कोई भी ज्ञात नहीं कर पा रहा था. मिल्खी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था और उसे इतना बीमार देख वो खुद अत्यंत दुखी रहने लग पड़ा था लेकिन बच्चों के सामने वो अपना दुःख नहीं दिखा पाया और केवल अपने तक ही उसे सिमित रखा। वो हर दूसरे दिन अपनी पत्नी को अलग अलग वैद के पास ले कर जाता लेकिन उस की बीमारी का कोई इलाज किसी के पास नहीं था। अंत में शायद दोनों काफी हद तक थक चुके थे, उसकी पत्नी की तबियत दिन प्रतिदिन बिगड़ती नज़र आ रही थी और मिल्खी कुछ नहीं कर पा रहा था, वो खुद को बहुत असहाय पा रहा था इस समय में। अब उसकी पत्नी में और हिम्मत नहीं थी लेकिन वो अपने बच्चों का मासूम चेहरा देख एक और दिन जी रही थी। जाड़े की एक रात सारा परिवार सोया तो सही, किन्तु सुबह मिल्खी की पत्नी की नींद खुली नहीं। वो अब इस दुनिया में नहीं रही थी, और छोड़ गयी थी पीछे एक दर्द में पति जो उसको संसार से ज्यादा प्रेम करता था, और दो छोटे नादान बच्चे, जिन्हें अभी तक ये अंदाज़ा नहीं था की असल में ये कितना बड़ा दर्द है।
आगे जारी...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें